सरदार उधम सिंह का जीवन परिचय

Sardar Udham Singh Biography in Hindi

Sardar Udham Singh Biography in Hindi:- जिस भारत में आज हम सभी सांस ले रहे है, वह पूर्ण रूप से स्वतंत्रत है। लेकिन, भारत हमेशा से ही स्वतंत्रत नहीं था।

जैसा कि हम सभी जानते है कि भारत पर 200 वर्षों तक अंग्रेजों का कब्ज़ा रहा। उन्होंने भारतीयों पर बहुत से अत्याचार किये।

15 अगस्त 1947 के दिन भारत देश को आजादी मिली। इस आजादी को प्राप्त करने के लिए कईं क्रांतिकारियों ने अपने जीवन को कुर्बान कर दिया।

इन क्रांतिकारियों की कुर्बानियों के कारण ही भारत को आजादी प्राप्त हुई। भारत के लोग धीरे-धीरे समय के बदलाव के साथ उन सभी क्रांतिकारियों को भूल रहे है।

उन सभी क्रांतिकारियों में से कुछ तो प्रसिद्ध हो गए और कुछ अंधकार में गुम हो गए। इन्हीं में से एक नाम है:- उधम सिंह, जिनके बारे में आज हम बात करने जा रहे है।

सरदार उधम सिंह का जीवन परिचय : Sardar Udham Singh Biography in Hindi

उधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 के दिन हुआ था। उधम सिंह का जन्म पंजाब प्रान्त में संगरुप जिले के सुनाम नाम के एक गांव में हुआ था।

उनका परिवार सिख-कम्बोज समुदाय से सम्बन्ध रखता था। उनके पिता का नाम श्रद्धा टेहल सिंह जम्मू था।

उनके जन्म के कुछ समय पश्चात ही सन 1907 में उनके पिता की मृत्यु हो गई और 6 वर्ष पश्चात उनकी माता की भी मृत्यु हो गई।

उनकी माता का नाम नारायण कौर उफ्र नरेन कौर था, जो कि एक गृहिणी थी। उनके पिता उपली गांव के रेलवे क्रांसिग में वाचमेन का काम किया करते थे।

उनके भाई का नाम मुक्ता सिंह था। दोनों बच्चों के सिर से शीघ्र ही माता-पिता का हाथ हट जाने से दोनों भाई अनाथ हो गए।

इसके पश्चात उन्हें और उनके भाई को अपना जीवनयापन करने के लिए अमृतसर के खालसा अनाथालय में शरण लेनी पड़ी।

वहीं से उन्होंने अपनी शिक्षा-दीक्षा शुरू की। लेकिन, कुछ समय बाद सन 1917 में उनके भाई का भी निधन हो गया।

इस घटना से उन्हें बहुत बड़ा झटका लगा। सन 1918 में खालसा अनाथालय से अपनी मेट्रिक की पढ़ाई पूरी करने के पश्चात सन 1919 में उन्होंने खालसा अनाथालय को छोड़ दिया।

अनाथालय में उन्हें व उनके भाई को नए नाम मिले, जो क्रमश है:- उधम सिंह और साधु सिंह। आगे चलकर वे इसी नाम से प्रसिद्ध हुए।

उधम सिंह सभी धर्मों का सम्मान किया करते थे। इसलिए, उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद सिंह रख दिया।

अनाथालय को छोड़कर उन्होंने क्रांतिकारियों के साथ हाथ मिला लिया और आजादी की लड़ाई से जुड़ गए। माता-पिता और भाई की मृत्यु के पश्चात उधमसिंह पूर्ण रूप से अकेले हो गए।

लेकिन, वह कभी भी विचलित नहीं हुए और देश की आजादी तथा अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए लगातार काम करते रहे। इसीलिए, उन्होंने कभी विवाह भी नहीं किया।

सरदार उधम सिंह जी की विचारधारा

बचपन से ही उधम सिंह देशप्रेम की भावना से भरे हुए थे। माना जाता है कि वह शहीद भगत सिंह द्वारा किये गए कार्यों से बहुत ज्यादा प्रभावित हुए।

इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक बार उधम सिंह को सन 1935 कश्मीर में शहीद भगत सिंह की तस्वीर के साथ पकड़ा गया था।

उस दौरान उधम सिंह को भगत सिंह का सहयोगी मान लिया गया था। उन्हें भगत सिंह का शिष्य भी माना जाता था।

कहा जाता है कि उन्हें देशभक्ति के गीत सुनना बहुत पसंद था। उन्हें कवि राम प्रसाद बिसिमल द्वारा लिखे गए गीत बहुत पसंद थे।

सरदार उधम सिंह जी की कहानी

उधम सिंह जी के जीवन में पहला मोड़ तब आया, जब 13 अप्रैल 1919 के दिन जलियावाला बाग हत्याकांड हुआ।

जहाँ जनरल डायर ने बिना किसी कारण उस समाहरोह में गोलियों की बारिश कर दी, जिससे न जाने कितने ही बेगुनाह लोगों की जान चली गई।

इस घटना से उधम सिंह को बहुत आहत हुआ। वह इस घटना के प्रत्यक्षदर्शियों में से एक थे।

तब उन्होंने जलियावाला बाग की मिट्टी को हाथ में लेकर प्रतिज्ञा ली कि वह जनरल डायर को मारकर ही चैन की साँस लेंगे।

सरदार उधम सिंह जी के द्वारा की गई प्रमुख गतिविधियाँ

उधम सिंह अपनी शिक्षा के दिनों से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में लगे हुए थे। सन 1913 में एक दल का निर्माण किया गया था, जिसका नाम गदर पार्टी रखा गया।

इसका मुख्य उद्देश्य भारत में क्रांति को और अधिक तीव्र गति से भड़काना था। क्रांति सिर्फ ऊपरी तौर पर न रहकर जनमानस के बीच पहुँचाना इसका मुख्य उद्देश्य था।

सन 1924 में वह इस गदर पार्टी से जुड़ गए। उधम सिंह को भगत सिंह का शिष्य माना जाता था। भगत सिंह के कार्यों से उधम सिंह बहुत प्रभावित हुए।

उधम सिंह अपने द्वारा लिए गए संकल्प को पूरा करने के लिए अलग-अलग नामों से विदेशों में यात्रा करने लग गए।

उन्होंने दक्षिण अफ्रीका, ज़िम्बाब्वे, ब्राजील, अमेरिका, नैरोबी एवं जर्मनी जैसे देशों में यात्राएं की। वर्ष 1920 में वह दक्षिण अफ्रीका चले गए।

वहाँ से सन 1921 में नैरोबी के रास्ते अमेरिका जाने की कोशिश करने लगे। लेकिन, किसी कारण से वीजा नहीं मिल पाया।

जिस कारण से उन्हें भारत वापस लौटना पड़ा। इसके बाद भी उन्होंने कईं बार कोशिश की। आखिरकार सन 1924 में उन्हें सफलता मिल गई और वह अमेरिका चले गए।

जहाँ वह सक्रिय गदर पार्टी में शामिल हो गए। सन 1927 में जनरल डायर की मृत्यु ब्रेन हेमरेज से हो गई। तब उधम सिंह ने माइकल ओ’डायर जो उस समय पंजाब के गवर्नर थे, उसे मारने की प्रतिज्ञा ली।

सन 1927 में भगत सिंह ने उधम सिंह को भारत वापस आने का संदेश भेजा। जब उधम सिंह संदेश पाकर अपने 25 सहयोगियों के साथ गोली-बारूद तथा बंदूक लेकर भारत वापस आ रहे थे।

तभी भारत पहुंचने पर बिना लाइसेंस की बंदूक रखने पर अंग्रेजी सेना ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्हें चार वर्ष तक जेल में रखा गया।

इस दौरान उन्हें कड़ी यातनाऐं दी गई। लेकिन, वह इतनी यातनाऐं सहने के बाद भी अपने संकल्प को भूले नहीं थे।

सन 1931 में रिहा होने के तुरंत बाद वह कश्मीर चले गए। कुछ समय कश्मीर में बिताने के बाद जर्मनी चले गए।

जहाँ से सन 1934 में वह लन्दन पहुंच गए। वहाँ पहुंचकर वह अपने कार्यों को अंजाम देने के लिए रणनीति बनाने लगे व सही समय का इंतजार करने लगे।

13 मार्च 1940 के दिन जलीयवाला बाग़ हत्याकांड के 21 वर्ष बाद लंदन के रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी के काक्सटन हॉल में एक बैठक चल रही थी।

जैसे ही बैठक शुरू हुई, इस वीर पुरुष ने आगे बढ़कर माइकल ओ’डायर के सीने में दो गोलियाँ डाल दी। जिससे माइकल ओ’डायर की मौके पर ही मौत हो गई।

अंततः उनका संकल्प पूरा हुआ। वह अपनी बंदूक को एक किताब में छिपाकर ले गए थे।

उन्होंने यह दिन इसलिए भी चुना क्योंकि, वह पूरी दुनिया के सामने माइकल ओ’डायर को उसके जघन्य अपराध की सजा दे सके।

गोली मारने के पश्चात उन्होंने भागने का प्रयास बिल्कुल भी नहीं किया। वह अपनी जगह पर शांत खड़े रहे और स्वयं को पुलिस के हवाले कर दिया।

वह अपने इस कार्य से बहुत गर्व महसूस कर रहे थे। आखिर उन्होंने वह कर दिखाया था, जो पिछले 21 वर्षों से हर भारतीय करना चाहता था।

सरदार उधम सिंह ने लन्दन में ब्रिटिश राज को पूरी तरह से हिला कर रख दिया था।

सरदार उधम सिंह जी की मृत्यु

स्वयं को पुलिस के हवाले करने के बाद उन पर अदालत में मुकदमा चलाया गया। 4 जून 1940 के दिन उन्हें माइकल ओ’डायर की मृत्यु का दोषी मान लिया गया था।

उन्हें 31 जुलाई 1940 के दिन ‘पेंटनविले जेल’ नामक जेल में फांसी पर लटका दिया गया था। 31 जुलाई 1974 के दिन उनकी 34वीं पुण्यतिथि के दिन उनके मृत शरीर के अवशेषों को भारत को सौंप दिया गया।

उनकी अस्थियों को सम्मानपूर्वक भारत लाया गया व उनके गांव पहुंचाया गया। जहाँ पर उनकी एक समाधि बनवाई गई है।

इस तरह मात्र 40 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन, इससे पहले उन्होंने अपने देशवासियों के लिए अपना सबकुछ न्योंछावर कर दिया।

उस समय उनकी मृत्यु की खबर जैसे ही भारत पहुंची, इस खबर ने क्रांतिकारियों के मध्य अंग्रेजो के लिए आक्रोश को और अधिक बढ़ा दिया।

उनकी मृत्यु के 7 वर्ष बाद 15 अगस्त 1947 के दिन ही भारत को आजादी मिल गई। भारत देश व इसके देशवासी उनके द्वारा दिए गए बलिदान का कर्ज कभी नहीं चुका पाएंगे।

सरदार उधम सिंह जी का सम्मान

उधम सिंह एक सिक्ख थे तथा सिक्खों के हथियार जो उनके पास थे, जैसे:- डायरी, चाकू, बंदूक व उनके द्वारा उपयोग की गई वस्तुओं को जैसे:- गोलियों को स्कॉटलैंड यार्ड के एक म्यूजियम जिसका नाम ब्लेक म्यूजियम है, उसमें आज भी सम्मान के रूप में रखा गया है।

राजस्थान के अनूपगढ़ में उनके नाम की एक चौकी बनाई गई है। झारखण्ड व उत्तराखंड में उधम सिंह नगर नाम उन्हीं के नाम से प्रेरित होकर रखा गया है।

अमृतसर में स्थित जलीयावाला बाग के निकट एक म्यूजियम बनाया गया है।

अंतिम शब्द

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